कोविशील्ड और कोवाक्सिन वैक्सीन (सांकेतिक तस्वीर)
– फोटो : सोशल मीडिया

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कोविशील्ड और कोवाक्सिन का एक और तुलनात्मक अध्ययन सामने आया है जिसके अनुसार ऑटोइम्युन रोगों से पीड़ित मरीजों में वैक्सीन बहुत अधिक कारगर नहीं मिल रही। इन्हें वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय सलाह की जरूरत है।

मेडिकल जर्नल मेडरेक्सिव में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार स्केलेरोडर्मा के 66 फीसदी, वास्कुलिटिस के 40 और गठिया के सात फीसदी मरीजों में कोविशील्ड या कोवाक्सिन की दो-दो खुराक देने के महीने भर बाद भी एंटीबॉडी नहीं मिलीं। कोच्चि के नेटोर स्थित सेंटर फॉर अर्थराइटिस, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस और अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज के डॉक्टरों ने यह संयुक्त अध्ययन किया है।

नई दिल्ली एम्स के रुमेटेलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. उमा कुमार ने कहा कि ऑटोइम्युन रोगियों पर वैक्सीन के कम असर होने के तथ्य काफी हद तक सही हैं। इम्मुनोसप्प्रेशन दवाओं की वजह से यह देखने को मिल रहा है। एम्स ने एक हजार मरीजों पर अध्ययन में पता लगाया था कि इन मरीजों में कोरोना के गंभीर होने की आशंका बहुत कम है क्योंकि इन्हें पहले से दवाएं जो दी जा रही हैं वह संक्रमण को रोकने में सफल हैं। हालांकि वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय परामर्श जरूरी है।

स्कलेरोडर्मा में कठोर होने लगती है त्वचा
स्क्लेरोडर्मा एक लाइलाज बीमारी है, जिसमें त्वचा का हिस्सा कठोर होने लगता है। 30 और 50 की उम्र के बीच होने वाली यह बीमारी महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करती है। अनुमान है कि देश में सालाना 10 लाख ऐसे मामले दर्ज होते हैं। वहीं गठिया से जुड़े एक करोड़ से अधिक मरीज सालाना अस्पतालों में इलाज ले रहे हैं। इसी तरह वास्कुलिटिस एक दुर्लभ बीमारी है जो सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर सकती है। ये भी सालाना 10 लाख मामले देखने को मिल रहे हैं। ऑटोइम्युन से जुड़ीं ऐसी अलग-अलग बीमारियों के लाखों मरीज अस्पतालों में इलाज ले रहे हैं। इन सभी के लिए वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय परामर्श जरूरी है।

अध्ययन के दो अहम निष्कर्ष

  • कोवाक्सिन की तुलना में कोविशील्ड से अधिक एंटीबॉडी विकसित हो रही हैं।
  • ऑटोइम्युन बीमारी से लड़ रहे मरीज स्टेरॉयड युक्त दवाओं का सेवन करते हैं। इन इम्मुनोसप्प्रेशन दवाओं की वजह से वैक्सीन पर असर पड़ता है।
कोविशील्ड से ज्यादा बनीं एंटीबॉडी
अध्ययन के लिए ऑटोइम्युन बीमारियों से ग्रस्त 136 मरीजों का चयन किया गया जिनमें पहले कोरोना संक्रमण नहीं मिला था। इनमें कोविशील्ड और कोवाक्सिन की दोनों खुराक लेने वाले मरीज हैं जिनमें दूसरी खुराक लगने के महीने भर बाद एंटीबॉडी की जांच की गई। इस दौरान पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले 120 में से 114 (95 फीसदी) मरीजों में एंटीबॉडी मिलीं, लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 16 में से 11 (68.76 फीसदी) में ही एंटीबॉडी देखने को मिलीं। कोविशील्ड वालों में एंटीबॉडी टाइट्रेस का स्तर पर भी अधिक था।

पुख्ता जांच के लिए स्वस्थ लोगों पर भी अध्ययन
अध्ययन के दौरान पुख्ता जानकारी के लिए 30-30 स्वस्थ लोगों को भी शामिल किया और इनमें पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले सभी लोगों में एंटीबॉडी मिलीं लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 30 में से 23 लोगों में ही एंटीबॉडी विकसित हुईं।

दुर्लभ बीमारियों पर वैक्सीन का असर
बीमारी               एंटीबॉडी बनीं            एंटीबॉडी नहीं
गठिया                   35 (92.10%)        3 (7.89%)
पैलिंड्रोमिक गठिया 16(94.11%)          1(5.88%)
ल्यूपस एरिथेमेटोसस   8(88.88%)        1(11.11%)
वास्कुलिटिस             3(60%)              2(40%)
स्क्लेरोडर्मा         1(33.33%)               2(66.66%)
मायोसिटिस           0                           1 (100%)

कोवाक्सिन के अध्ययन पर में कमी
कोविशील्ड और कोवाक्सिन को लेकर सामने आए देश के पहले अध्ययन को लेकर अब बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। एक ओर सोशल मीडिया पर भारत बायोटेक कंपनी के चेयरमेन डॉ. कृष्णन ईला के बेटे डॉ. रैचेस इला ने अध्ययन को आधारहीन बताया। वहीं शोद्यार्थियों ने भी सोशल मीडिया पर उन्हें पूरे सबूत देने का दावा तक किया।

इस बीच बुधवार को हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी ने बयान दिया कि इस अध्ययन में बहुत खामियां हैं। कंपनी ने यहां तक कहा कि यह एक सहकर्मी-समीक्षा प्रकाशन नहीं है। न ही सांख्यिकीय और वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किया गया अध्ययन है। इसके अलावा यह अध्ययन क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री या फिर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (सीडीएससीओ) के अधीन कार्यरत एसईसी समिति से मंजूरी लेकर की गई है। अध्ययन का डिजाइन और आचरण पूर्व निर्धारित परिकल्पना के बजाय एक तदर्थ विश्लेषण को दर्शाता है।

विस्तार

कोविशील्ड और कोवाक्सिन का एक और तुलनात्मक अध्ययन सामने आया है जिसके अनुसार ऑटोइम्युन रोगों से पीड़ित मरीजों में वैक्सीन बहुत अधिक कारगर नहीं मिल रही। इन्हें वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय सलाह की जरूरत है।

मेडिकल जर्नल मेडरेक्सिव में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार स्केलेरोडर्मा के 66 फीसदी, वास्कुलिटिस के 40 और गठिया के सात फीसदी मरीजों में कोविशील्ड या कोवाक्सिन की दो-दो खुराक देने के महीने भर बाद भी एंटीबॉडी नहीं मिलीं। कोच्चि के नेटोर स्थित सेंटर फॉर अर्थराइटिस, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस और अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज के डॉक्टरों ने यह संयुक्त अध्ययन किया है।

नई दिल्ली एम्स के रुमेटेलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. उमा कुमार ने कहा कि ऑटोइम्युन रोगियों पर वैक्सीन के कम असर होने के तथ्य काफी हद तक सही हैं। इम्मुनोसप्प्रेशन दवाओं की वजह से यह देखने को मिल रहा है। एम्स ने एक हजार मरीजों पर अध्ययन में पता लगाया था कि इन मरीजों में कोरोना के गंभीर होने की आशंका बहुत कम है क्योंकि इन्हें पहले से दवाएं जो दी जा रही हैं वह संक्रमण को रोकने में सफल हैं। हालांकि वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय परामर्श जरूरी है।

स्कलेरोडर्मा में कठोर होने लगती है त्वचा

स्क्लेरोडर्मा एक लाइलाज बीमारी है, जिसमें त्वचा का हिस्सा कठोर होने लगता है। 30 और 50 की उम्र के बीच होने वाली यह बीमारी महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करती है। अनुमान है कि देश में सालाना 10 लाख ऐसे मामले दर्ज होते हैं। वहीं गठिया से जुड़े एक करोड़ से अधिक मरीज सालाना अस्पतालों में इलाज ले रहे हैं। इसी तरह वास्कुलिटिस एक दुर्लभ बीमारी है जो सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर सकती है। ये भी सालाना 10 लाख मामले देखने को मिल रहे हैं। ऑटोइम्युन से जुड़ीं ऐसी अलग-अलग बीमारियों के लाखों मरीज अस्पतालों में इलाज ले रहे हैं। इन सभी के लिए वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय परामर्श जरूरी है।

अध्ययन के दो अहम निष्कर्ष

  • कोवाक्सिन की तुलना में कोविशील्ड से अधिक एंटीबॉडी विकसित हो रही हैं।
  • ऑटोइम्युन बीमारी से लड़ रहे मरीज स्टेरॉयड युक्त दवाओं का सेवन करते हैं। इन इम्मुनोसप्प्रेशन दवाओं की वजह से वैक्सीन पर असर पड़ता है।

कोविशील्ड से ज्यादा बनीं एंटीबॉडी

अध्ययन के लिए ऑटोइम्युन बीमारियों से ग्रस्त 136 मरीजों का चयन किया गया जिनमें पहले कोरोना संक्रमण नहीं मिला था। इनमें कोविशील्ड और कोवाक्सिन की दोनों खुराक लेने वाले मरीज हैं जिनमें दूसरी खुराक लगने के महीने भर बाद एंटीबॉडी की जांच की गई। इस दौरान पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले 120 में से 114 (95 फीसदी) मरीजों में एंटीबॉडी मिलीं, लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 16 में से 11 (68.76 फीसदी) में ही एंटीबॉडी देखने को मिलीं। कोविशील्ड वालों में एंटीबॉडी टाइट्रेस का स्तर पर भी अधिक था।

पुख्ता जांच के लिए स्वस्थ लोगों पर भी अध्ययन

अध्ययन के दौरान पुख्ता जानकारी के लिए 30-30 स्वस्थ लोगों को भी शामिल किया और इनमें पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले सभी लोगों में एंटीबॉडी मिलीं लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 30 में से 23 लोगों में ही एंटीबॉडी विकसित हुईं।

दुर्लभ बीमारियों पर वैक्सीन का असर

बीमारी               एंटीबॉडी बनीं            एंटीबॉडी नहीं

गठिया                   35 (92.10%)        3 (7.89%)

पैलिंड्रोमिक गठिया 16(94.11%)          1(5.88%)

ल्यूपस एरिथेमेटोसस   8(88.88%)        1(11.11%)

वास्कुलिटिस             3(60%)              2(40%)

स्क्लेरोडर्मा         1(33.33%)               2(66.66%)

मायोसिटिस           0                           1 (100%)

कोवाक्सिन के अध्ययन पर में कमी

कोविशील्ड और कोवाक्सिन को लेकर सामने आए देश के पहले अध्ययन को लेकर अब बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। एक ओर सोशल मीडिया पर भारत बायोटेक कंपनी के चेयरमेन डॉ. कृष्णन ईला के बेटे डॉ. रैचेस इला ने अध्ययन को आधारहीन बताया। वहीं शोद्यार्थियों ने भी सोशल मीडिया पर उन्हें पूरे सबूत देने का दावा तक किया।

इस बीच बुधवार को हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी ने बयान दिया कि इस अध्ययन में बहुत खामियां हैं। कंपनी ने यहां तक कहा कि यह एक सहकर्मी-समीक्षा प्रकाशन नहीं है। न ही सांख्यिकीय और वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किया गया अध्ययन है। इसके अलावा यह अध्ययन क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री या फिर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (सीडीएससीओ) के अधीन कार्यरत एसईसी समिति से मंजूरी लेकर की गई है। अध्ययन का डिजाइन और आचरण पूर्व निर्धारित परिकल्पना के बजाय एक तदर्थ विश्लेषण को दर्शाता है।

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