आज का जीवन मंत्र: कोई भी काम शांति के साथ और योजना बनाकर करना चाहिए, सफलता तभी मिल सकती है

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4 दिन पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता

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कहानी– सुग्रीव ने जब दो राजकुमारों को अपनी ओर आते देखा तो वे डर गए। उन्हें लग रहा था कि मेरे भाई बालि ने इन दोनों को मुझे मारने के लिए भेजा है। ये दो राजकुमार राम और लक्ष्मण थे।

सुग्रीव ने अपने मंत्री हनुमान से कहा, ‘आप जाकर उन दोनों राजकुमारों को देखो। अगर वे शत्रु हैं तो वहीं से इशारा कर देना, हम यहां से कहीं और भाग जाएंगे। अगर वे मित्र हैं तो वहीं से इशारा करना हम यहीं रुक जाएंगे।’

हनुमान जी तुरंत ही दोनों राजकुमारों के पास पहुंचे। उन्होंने अपना परिचय दिया और उनका परिचय लिया। राम-लक्ष्मण और हनुमान एक-दूसरे को पहचान गए। तब हनुमान जी ने कहा, ‘आप मेरे राजा सुग्रीव के पास चलिए और उनसे मैत्री कीजिए, वे देवी सीता की खोज में आपकी मदद करेंगे।’

हनुमान जी ने आगे कहा, ‘आप मेरे कंधे पर बैठ जाइए, मैं आपको सुग्रीव के पास ले चलता हूं।’

लक्ष्मण जी को संकोच हो रहा था कि किसी के कंधे पर चढ़कर चलना ठीक नहीं है, लेकिन राम ने कहा, ‘लक्ष्मण, हम अयोध्या से सुमंत के रथ में आए, फिर केवट की नाव में बैठे, उसके बाद पैदल चले। अब ये यात्रा का एक नया ढंग है। मैं बैठ रहा हूं, तुम भी बैठ जाओ।’

काफी लोग इस संबंध में टिप्पणी करते हैं कि हनुमान जी ने उस समय राम-लक्ष्मण को कंधे पर क्यों बैठाया?

हनुमान जी दूरदर्शी थे, उन्होंने राम-लक्ष्मण को कंधे पर इसलिए बैठाया, क्योंकि दूर से उनका राजा सुग्रीव ये दृश्य देख रहा था। जैसे ही उन्होंने राम-लक्ष्मण को कंधे पर बैठाया, सुग्रीव समझ गए कि ये हमारे मित्र हैं। तभी तो हनुमान इन्हें कंधे पर बैठाकर ला रहे हैं। ये देखकर सभी निश्चिंत हो गए।

सीख- हनुमान जी की ये कार्यशैली हमें समझा रही है कि बहुत कुछ बातें संकेत में की जा सकती हैं और सही समय पर की जानी चाहिए। अगर हनुमान जी ने समय पर सुग्रीव को ये संकेत न दिया होता कि ये हमारे मित्र हैं तो सुग्रीव और ज्यादा डरते। हनुमान जी की बुद्धिमानी से हमें सीखना चाहिए कि हर काम बुद्धिमानी से और योजना बनाकर करना चाहिए, सफलता तभी मिल सकती है।

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