न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Sun, 06 Jun 2021 07:00 PM IST

सार

महाकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो’ प्रेरणादायी और मुश्किल घड़ी में हौसला बढ़ाने वाली है। पुणे के कमाल शेख जैसे लोग शायद इसी तर्ज पर जीवन संघर्ष कर रहे हैं। 
 

पुणे की सड़क पर गाने गाते कमाल शेख
– फोटो : social media

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कोरोना महामारी ने कई की घर उजाड़ दिए हैं तो कई की रोजी-रोटी का साधन, लेकिन इंसानी की जीवटता इसी बात में है कि वह संघर्ष से पीछे नहीं हटता। मन से हार नहीं मानी तो क्या महामारी और क्या जिंदगानी, सब से लोहा लेते हुए जीता जा सकता है। पुणे के 51 साल के कमाल शेख इसी संघर्ष की मिसाल हैं। 

कमाल शेख पुणे की सालुंके विहार रोड पर खड़े माइक्रोफोन और एक छोटे स्पीकर के माध्यम से किशोर कुमार, मोहम्मद रफी जैसे ख्यात गायकों के गीत गुनगुना कर सुबह दौड़ते भागते लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। वे लोगों को पुराने गाने सुनाकर न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि अपने उदर पोषण का जुगाड़ भी कर लेते हैं। 

इसलिए हुए सड़क पर गाने को मजबूर
कोरोना के पहले तक वे शादियों, पार्टियों व अन्य कार्यक्रमों में स्टेज कलाकार बतौर गाने गाते थे। जब से लॉकडाउन लगा, ये सब बंद हो गई हैं। कमाल शेख अब सड़कों पर गाने के लिए मजबूर हैं। सुबह के वक्त जब कुछ घंटों के लिए पुणे में आवाजाही की छूट होती है, उस वक्त वे गली के मोड़ पर छोटा-सा स्पीकर व माइक लेकर खड़े हो जाते हैं और अपनी सुरीली आवाज में गीत गाते हैं। 

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले
कमाल शेख मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले हैं। जब वे गीत गाते हैं तो उनके आसपास भीड़ जमा हो जाती है। कुछ लोग उन पर दया कर पैसा दे देते हैं। हालांकि वह राशि बहुत ज्यादा नहीं होती, लेकिन जितना भी पैसा मिल जाता है, उससे वे संतोष करते हैं। इससे पहले वे शादियों व अन्य कार्यक्रमों में गाकर महीने का 20 हजार रुपया तक कमा लेते थे, लेकिन महामार ने उन्हें भी सड़क पर ला दिया है। 

पहले कमाल शेख बंगाल में अपने परिजनों के लिए भी पैसा भेज पाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें इसका अफसोस है। उन्हें उम्मीद है कि जल्द सब चीजें सामान्य होंगी और पहले की तरह वह फिर से ज्यादा पैसा कमाकर अपने परिवार का पेट भरने में मदद कर सकेंगे। 

विस्तार

कोरोना महामारी ने कई की घर उजाड़ दिए हैं तो कई की रोजी-रोटी का साधन, लेकिन इंसानी की जीवटता इसी बात में है कि वह संघर्ष से पीछे नहीं हटता। मन से हार नहीं मानी तो क्या महामारी और क्या जिंदगानी, सब से लोहा लेते हुए जीता जा सकता है। पुणे के 51 साल के कमाल शेख इसी संघर्ष की मिसाल हैं। 

कमाल शेख पुणे की सालुंके विहार रोड पर खड़े माइक्रोफोन और एक छोटे स्पीकर के माध्यम से किशोर कुमार, मोहम्मद रफी जैसे ख्यात गायकों के गीत गुनगुना कर सुबह दौड़ते भागते लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। वे लोगों को पुराने गाने सुनाकर न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि अपने उदर पोषण का जुगाड़ भी कर लेते हैं। 

इसलिए हुए सड़क पर गाने को मजबूर

कोरोना के पहले तक वे शादियों, पार्टियों व अन्य कार्यक्रमों में स्टेज कलाकार बतौर गाने गाते थे। जब से लॉकडाउन लगा, ये सब बंद हो गई हैं। कमाल शेख अब सड़कों पर गाने के लिए मजबूर हैं। सुबह के वक्त जब कुछ घंटों के लिए पुणे में आवाजाही की छूट होती है, उस वक्त वे गली के मोड़ पर छोटा-सा स्पीकर व माइक लेकर खड़े हो जाते हैं और अपनी सुरीली आवाज में गीत गाते हैं। 

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले

कमाल शेख मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले हैं। जब वे गीत गाते हैं तो उनके आसपास भीड़ जमा हो जाती है। कुछ लोग उन पर दया कर पैसा दे देते हैं। हालांकि वह राशि बहुत ज्यादा नहीं होती, लेकिन जितना भी पैसा मिल जाता है, उससे वे संतोष करते हैं। इससे पहले वे शादियों व अन्य कार्यक्रमों में गाकर महीने का 20 हजार रुपया तक कमा लेते थे, लेकिन महामार ने उन्हें भी सड़क पर ला दिया है। 

पहले कमाल शेख बंगाल में अपने परिजनों के लिए भी पैसा भेज पाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें इसका अफसोस है। उन्हें उम्मीद है कि जल्द सब चीजें सामान्य होंगी और पहले की तरह वह फिर से ज्यादा पैसा कमाकर अपने परिवार का पेट भरने में मदद कर सकेंगे। 

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