महालया का आखिरी दिन आज: सूर्य के जरीये ही हमारे पितरों तक पहुंचता है श्राद्ध, इस बार शुभ संयोग में सूर्य को जल चढ़ाने से भी संतुष्ट होंगे पितर

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  • Today, The Festival Of Pitrumoksha Reaches Our Ancestors Only Through The Sun, This Time The Ancestors Will Be Satisfied Even By Offering Water To The Sun In Auspicious Coincidence.

4 दिन पहले

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  • सूर्य किरण के जरीये चंद्रमा से आते हैं पितर इसलिए पुराणों में सूर्य का एक नाम पितर भी बताया गया है

6 अक्टूबर, बुधवार यानी आज सर्वपितृ अमावस्या पर ग्रह-नक्षत्रों का शुभ योग बन रहा है। सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों के लिए श्राद्ध और दान किया जाता है। इससे पितृ पूरी तरह संतुष्ट हो जाते हैं। वायु रुप में धरती पर आए पितरों को इसी दिन विदाई दी जाती है और पितृ अपने लोक चले जाते हैं।

पद्म, मार्कंडेय और अन्य पुराणों में कहा गया है कि अश्विन महीने की अमावस्या पर पितृ पिंडदान और तिलांजलि चाहते हैं। उन्हें यह नहीं मिलता तो वे अतृप्त होकर ही चले जाते हैं। इससे पितृदोष लगता है। मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करने के बाद भी अमावस्या पर जाने-अनजाने में छुटे हुए सभी पीढ़ियों के पितरों को श्राद्ध के साथ विदा किया जाना चाहिए। इसी को महालय श्राद्ध कहा जाता है। इसलिए इसे पितरों की पूजा का उत्सव यानी पितृ पर्व कहा जाता है।

शुभ संयोग: सूर्य रहेगा अपने ही नक्षत्र में
पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र का कहना है कि पितृ मोक्ष अमावस्या पर ही सूर्य और चंद्रमा दोनों ही हस्त नक्षत्र में हैं। जो कि सूर्य का नक्षत्र होता है। इस दिन सूर्य को जल चढ़ाने से भी पितरों का तृप्ति मिलती है। पुराणों में कहा गया है कि आर्थिक स्थिति या देश, काल, परिस्थिति के मुताबिक अगर श्राद्ध करने की स्थिति में न हो, समय की कमी हो या जरूरी चीजें न हो तो सिर्फ सूर्य को जल चढ़ाने से भी पितरों को तृप्ति मिल जाती है। जल चढ़ाते वक्त भगवान सूर्य से पितरों की संतुष्टि की प्रार्थना करनी चाहिए।

सूर्य किरण के जरीये चंद्रमा से आते हैं पितर
सूर्य की हजारों किरणों में जो सबसे खास है उसका नाम ‘अमा’ है। उस अमा नाम की किरण के तेज से सूर्य सभी जगहों को रोशन करता है। जब चंद्रमा और सूर्य के बीच 0 डिग्री का अंतर होता है। तब उसी अमा किरण में चंद्र का भ्रमण होता है। उस किरण के जरीये ही चंद्रमा के उपरी हिस्से से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि का महत्व बताया गया है।

सूर्य का पितरों से संबंध
सू्र्य के जरीये ही श्राद्ध हमारे पितरों तक पहुंचता है। इसलिए पुराणों में सूर्य का एक नाम पितर भी बताया गया है। ज्योतिष में सूर्य आत्मा का कारक ग्रह होता है। इसलिए जब सूर्य अपने ही नक्षत्र में हो तब श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शान्ति मिलती है। कुण्डली में सूर्य की अशुभ स्थिति की वजह से ही पितृदोष होता है। इस बार पितरों की तिथि यानी अमावस्या पर हस्त नक्षत्र रहेगा। जिसका स्वामी सूर्य होने से इस दिन श्राद्ध करने पर पितृदोष से शान्ति मिलेगी।

चंद्रमा का पितरों से संबंध
धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि हमारे पूर्वज जो मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, वे पितर बन जाते हैं। इसके बाद उनका निवास स्थान चन्द्रमा का उपरी हिस्सा होता है। विपरीत दिशा में होने के कारण उसे हम देख नहीं सकते हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में इसे ही पितृलोक कहा गया है।

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