E-इश्क: तुम्हारी उस एक चुप्पी में मैं आज तक जल रही हूं दीप, तुम सबको बोलने और शेयर करने का पाठ पढ़ाते हो, क्या तुमने मुझसे कुछ शेयर किया?

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3 दिन पहले

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मेंटल हेल्थ और डिसऑर्डर्स के सेमिनार का आखिरी दिन। नीरजा जानबूझकर आज सेमिनार में लेट पहुंची थी। पेपर्स साइन कर और आईडी कार्ड गले में डालकर उसने हॉल में कदम रखा तो देखा, स्टेज पर डॉक्टर देवेश मिश्रा अपनी बुजुर्गाना आवाज में डॉ. कुलदीप माथुर का इंट्रोडक्शन करवा रहे हैं। वह चुपचाप हॉल के आखिर में रखी, खाली कुर्सियों में से एक कुर्सी पर बैठ गई। डॉ. कुलदीप माथुर जानेमाने मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट और काउंसलर ने तालियों के शोर के बीच स्टेज संभाला। पॉजिटिव रिलेशनशिप और मेंटल हेल्थ पर डॉ. माथुर ने बोलना शुरू किया। पूरा हॉल उनकी बात सुन रहा था और नीरजा आंखें बंद किए अतीत में भटक रही थी…
कॉलेज के दिन… कुलदीप, शरद, यामिनी और न जाने कौन-कौन… शोर शराबा… बहस… छेड़खानियां… इश्क के पुर्जे… हॉस्टल से भागना… कॉलेज कैंपस में आंखों ही आंखों में बतियाना… कहां-कहां घूम आई नीरजा, उस 45 मिनट के लेक्चर में। ध्यान टूटा जब डॉ. कुलदीप माथुर अपना आखिरी वाक्य बोल रहे थे…’प्लीज स्पीक आउट… मन की बात मन में न रखें… शेयर इट… ओपन अप।’ और अपनी प्यारी-सी एवरग्रीन मुस्कुराहट के साथ प्रोजेक्टर स्क्रीन के जरिए हॉल में बैठे सभी श्रोताओं को इस तरह देखा जैसे सबके दिल में उतरने को तैयार हों। वैसे भी डॉ. माथुर दो दिन के सेमिनार की हाईलाइट थे। यंग डॉक्टर्स उनको घेरकर खड़े हो गए और अमेरिकन स्टार जैसी पर्सनैलिटी के मालिक डॉ. माथुर सबको अपनी बातों से लुभा रहे थे।
नीरजा हॉल में दूर खड़े होकर जान पहचान के लोगों से बात कर रही थी कि तभी ऑर्गनाइजर्स में से एक महिला ने आकर उसे लिफाफा थमाया। नीरजा ने अलग हटकर लिफाफा खोला। उसके नाम नोट था, ‘नीरू मैं रूम नंबर 308 में हूं, प्लीज आकर मिलो।’ दस मिनट बाद नीरजा थर्ड फ्लोर के रूम नंबर 308 के बाहर खड़ी थी। इससे पहले कि वह डोर नॉक करती डॉ. कुलदीप माथुर ने दरवाजा खोल दिया।
नीरजा कमरे में घुसी। उसने देखा कहीं भी कुछ बिखरा हुआ नहीं था। बेड पर सिर्फ टाई पड़ी थी, जो शायद रूम में आते के साथ ही खोलकर रख दी गई थी। वह रूम में रखी सोफा चेयर पर बैठ गई। डॉ. माथुर कॉफी ऑर्डर कर नीरजा के सामने बैठते हुए बोले, “सब ठीक चल रहा है न नीरू? तुम खुश तो हो न?”
नीरजा हल्के से मुस्कुरा दी। “मेरी खुद से लड़ाई कभी बंद नहीं होती डॉ. माथुर। कहीं से याद की थोड़ी सी भी किरच झड़ती है तो बहुत कुछ याद आ जाता है।”
“पर तुम्हें तो परफेक्शन की तलाश थी… तुम्हें मिला भी। जो तुम्हारी परफेक्शन की परिभाषा पर खरा था।”
“परफेक्शन एक धोखा है दीप।” नीरजा को तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया। डॉ. माथुर ने आंख उठाकर उसे देखा और वो सकपका गई।
“पर उदासी तुम पर नहीं जंचती नीरू… ये तुम्हें इंट्रोवर्ट बना देती है। इस कैद से बाहर निकलो। तुम नाराजगियों को अपने अंदर जकड़े रखती हो। उन्हें बांधो मत। उन्हें बहने दो नीरू।”
“ये तुम कह रहे हो दीप… ये चुप्पी तुम्हीं से तो सीखी है।”
डॉ. माथुर थोड़ा अनकंफर्टेबल होकर बोले, “तो तुम उस चुप्पी की मुझे सजा दोगी। मैं भी तो सजा काट रहा हूं नीरू।”
“तुम सजा काट रहे हो… मैं सजा भोग रही हूं। दो अलग हस्तियों के साथ जीती हूं। एक जिसे दुनिया देखती है… दूसरी जिसे मैं देखती हूं। तुम्हें पता है मैं सांस भी नहीं ले पाती।”
“पहेलियों में बातें मत करो नीरू… प्लीज बोलो।” डॉ. माथुर के चेहरे पर बेचैनी उभर आई थी। नीरजा का चेहरा फीका पड़ने लगा था। कॉफी के कप के किनारे पर उसकी उंगलियां मन का भंवर उकेर रही थीं… आंखें अंदर के टूटते बांध की चुगली करने को उतारू थीं। डॉ. माथुर ने सिगरेट का पैकेट उठाया और खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। खिड़की खुली थी और ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।
“तुम सिगरेट के पैकेट से खेलना बंद करो दीप… यू कैन स्मोक।”
“क्यों… क्या अब तुम्हें सिगरेट का धुआं बुरा नहीं लगता?”
“वो पहले भी बुरा नहीं लगता था, पर तुम्हें इससे दूर रखने के लिए शोर मचाती थी।”
“पर मेरी उंगलियों से आती सिगरेट की महक तुम्हें पसंद थी,” डॉ. माथुर ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा।
नीरजा का चेहरा बुझ गया। “इतना जानते हुए भी तुमने वो सब नहीं कहा जो कहना चाहिए था।”
“क्यों… क्या कहना जरूरी था?”
नीरजा के अंदर जैसे कुछ फटा, “डॉ. कुलदीप माथुर, स्पीक आउट पर इतना बड़ा लेक्चर देकर लौटे हैं और मुझसे ये सवाल कर रहे हैं?”
“लेकिन शरद तो स्मोक नहीं करता,” डॉ. माथुर ने नजर चुराते हुए बात को बदलना चाहा।
“वो स्मोक नहीं करता, लेकिन मुझे जलाने के लिए सिगरेट जरूर जलाता है। और मैं जीने के लिए जलती हूं।”
नीरजा उठी और डॉ. माथुर की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई। दिसंबर की ठंड में उसका शॉल कंधे से खिसक कर नीचे आ गया। वह सूखे पत्ते सी कांप रही थी। डॉ. माथुर ने देखा नीरजा की पीठ और गर्दन पर जले के निशान थे। वो जैसे वहीं जमकर रह गए।
“तुम्हारी उस एक चुप्पी में मैं आज तक जल रही हूं दीप… तुम सबको बोलने और शेयर करने का पाठ पढ़ाते हो, क्या तुमने मुझसे कुछ शेयर किया… तुमने तो मेरे लिए अपना प्यार भी मुझसे छुपाया… अपने आप तक से छुपाया… क्यों?”
नीरजा के बोल डॉ. माथुर को सुन्न कर गए। उन्होंने आगे बढ़कर नीरजा को अपनी बांहों में समेटना चाहा, पर वह झटक कर दूर जा खड़ी हुई।
“जली परछाइयां प्यार नहीं करतीं दीप। तन्हाइयों की राख से गीत नहीं उपजते। तुम्हारे प्यार की ग्रामर मेरी समझ से परे है… बारिश की चुभती बूंदों में तुम होते हो। जून की दुपहरी-सा तपाते हो तुम… दिसंबर की इस ठंड में लू से लगते हो… मेरे अतीत में रहते हो… मेरे वर्तमान से जुड़े हो… पर तुम होकर भी नहीं होते दीप…” नीरजा सिसक रही थी। डॉ. माथुर ने झुककर उसका शॉल उठाया और उसके कंधों को ढंकते हुए बोले, “अभी तो तुम्हारे सामने हूं।”
“पर अब तुम मुझे नजर नहीं आते दीप!” कहकर नीरजा रूम नंबर 308 से बाहर निकल गई। डॉ. कुलदीप माथुर, मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट बंद कमरे में अपना सिर पकड़े सिसकियां लेकर रो रहे थे।
– रश्मि

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