1 घंटे पहले

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“अगर पत्नी को कुछ हो जाए तो उसे पति संभाल सकता है लेकिन पति को कुछ हो जाए तो पत्नी असहाय हो जाती है”

सुबह बेड टी पीते समय न जाने कैसे मेरे मुंह से निकल गया।

“इतना नेगेटिव क्यों सोचा करती हो अन्नू?”

“अरे, मैंने तो जनरल बात की थी। अब मुझे ही देखिए न। वीनू, कुशल दोनों बेटे विदेश में हैं। न किसी डॉक्टर से जान पहचान है न ही किसी अस्पताल तक ही पहुंच पाती हूं। आपने भी तो मुझे कभी आत्मनिर्भर बनने ही नहीं दिया है”

“इंसान जब मुसीबत में होता है न तो, ईश्वर किसी न किसी रूप में आकर सहायता ज़रूर करते हैं। बस ईश्वर में आस्था होनी चाहिए”

कहते हैं 24 घंटों में एक समय ऐसा ज़रूर आता है जब, सरस्वती जी हर इंसान की जीभ पर आकर बैठती हैं और मुंह से निकली बात सच साबित हो जाती है। उसी शाम अचानक सुनील को हार्ट अटैक आया और उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। तब विश्वंभर जी को, अस्पताल में मेरी सहायता करते और सुनील की सेवा करते समय ऐसा ही महसूस हुआ था मुझे। न ही वो हमारे मित्र थे, न ही संबंधी,फिर भी घंटों इनके पास बैठे रहते।

बाद में पता चला, वो हर मरीज़ की सेवा इसी तरह करते हैं। किसी को भी कोई तकलीफ़ हो,एक वालंटियर की तरह उसकी तीमारदारी के लिये प्रस्तुत हो जाते हैं। उसका दाख़िला अस्पताल में करवाते हैं। दवाइयों का प्रबंध करना, खून आदि की व्यवस्था करना, एक्सरे, सोनोग्राफ़ी, मैमोग्राफी की तारीख़ लेने तक का पूरा काम, अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर करते हैं।

वैसे कहने वाले ये भी कहते थे कि “विश्वंभर जी का मिज़ाज तोड़ा रंगीन था। उनका पारिवारिक जीवन सुखद नहीं है, पत्नी को आर्थराइटिस है, चल फिर भी नहीं सकती। इसीलिए अपना ग़म ग़लत करने के लिए वो, डॉक्टरों के साथ बैठकर शराब पीते हैं और पिलाते भी हैं। सुंदर नर्सों के चेहरे देखकर, अपनी आंखों की क्षुधा को शांत करते हैं“ फिर एक भद्दी सी हंसी से पूरा माहौल गूंज उठता।

जिज्ञासा तो मेरे मन में भी थी। आख़िर, मरीज़ों के प्रति, विश्वंभर जी के आत्मीयता पूर्ण व्यवहार का कारण क्या रहा होगा? जिज्ञासा ने दिलचस्पी को जन्म दिया और एक दिन मैंने उन के सामने सीधे सपाट शब्दों में अपना प्रश्न रख ही दिया। संकोच से झेंपते हुए, पर गंभीरता का अंकुश लगाते हुए बोले,

“ ये एक बहुत लंबी कहानी है। आप तो कहानियां लिखती हैं। पहले वादा कीजिये मेरी कहानी भी फ़ेसबुक पर ज़रूर डालेंगी”

मैं सोचने पर मजबूर हो गयी। ’कहानी लायक़ कोई बात होगी तभी तो लिखूंगी। प्लॉट, किरदार, पृष्टभूमि, और फिर अंत में निष्कर्ष। इन सब को मिलाकर एक सुंदर सी कहानी बनती है। लेकिन ये सब मैं उन से नहीं कह सकी। सिर्फ़ इतना ही कहा,

“ कुछ बताइये भी तो”

“उसे भुलाना मेरे बस में नहीं, और पाना मेरी क़िस्मत में नहीं था”

“बहुत प्यार करते थे उसे?”

“इश्क़ था या इबादत, कुछ समझ में नहीं आता था, बस ये समझ लीजिए वो एक खूबसूरत ख़याल था जो दिल से अभी तक नहीं जाता”

मैंने अपनी सवालिया निगाहें उनके चेहरे पर टिका दीं। ”एस्तर नाम था उसका”

बहुत शर्माते हुए एक लजाई सी मुस्कान पर गंभीरता का मुलम्मा लगाते हुए उन्होंने कहना शुरू किया,

“ इसी अस्पताल में हमारी भेंट हुई थी।”

मुझे मन ही मन में हंसी आ गयी। मुलाक़ात हुई, वो भी अस्पताल में? विश्वंभर नाथ ने अपनी बात ज़री रखते हुए कहना शुरू किया,

“उन दिनों मैं सी ए कर रहा था। माता पिता और पूरा परिवार सिंगापुर में था। बस ये समझ लीजिये, अपनी देखभाल मुझे ख़ुद ही करनी पड़ती थी। उन्हीं दिनों, मुझे भयंकर पेट दर्द हुआ। दोस्तों ने मुझे अस्पताल में भर्ती करा दिया। अपेंडिक्स, अल्सर, आंतों का संक्रमण जैसी अनेक भयानक भयानक बीमारियों के नाम दिमाग़ में आते रहते थे। हर तरह के टेस्ट हुए अंत में डॉक्टर इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि मेरे गॉलब्लेडर में स्टोन था। एस्तर, इसी वार्ड में नर्स थी। उसने मेरी इतनी सेवा की, कि शायद अपना कोई सगा संबंधी भी विरले ही करता। उसके चेहरे की मुस्कान देखकर ऐसा महसूस होता जैसे नर्स के अंदर, सेवा भाव के साथ साथ, स्नेह का भाव भी मरीज़ के लिए बेहद ज़रूरी है।

उन्हीं दिनों हमारा रिश्ता मरीज़ और नर्स से होता हुआ, दोस्ती में बदल गया। सुबह सुबह वो, गुलाब का छोटा सा फूल मेरे सिरहाने लाकर ज़रूर रख देती। एस्तर प्यार से भी प्यारी थी। वो ऐसा खूबसूरत ख़याल थी जिसके बारे में सोचते ही चेहरे पर ख़ुशी आ जाए। मैं उसे दिलोजान से चाहने लगा था।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी मैंने एस्तर की ड्यूटी के निर्धारित समय पर, अस्पताल जाना नहीं छोड़ा। किसी न किसी बहाने से मैं, अस्पताल चला जाता था। वहां से एस्तर मुझे अपने हॉस्टल ले जाती। मुझे बैडमिंटन खेलने का बहुत शौंक था। ऑफिस से आकर मैं शॉर्ट्स, स्टॉकिंग्स, टी शर्ट या ब्लेजर पहन कर खेलने चला जाता और वो ड्यूटी के बाद सीधे मेरे फ़्लैट पर चली आती थी। मेरा कमरा व्यवस्थित करके दो कप कॉफ़ी तैयार करके मेरा इंतज़ार करती।

जब उसकी नाइट ड्यूटी होती तो वो, कुछ जल्दी ही मेरे फ़्लैट पर आ जाती थी। हम एक साथ कॉफी पीते। फिर मैं उसके साथ अस्पताल जाता और वहां कई कई घंटे मरीज़ों की देखभाल में उसकी मदद करता। जब सब लोग सो जाते तो हम, देर रात तक धीरे धीरे बातें करते। किसी मरीज़ को तकलीफ़ होती तो हम फिर से उसकी तीमारदारी में जुट जाते।

एस्तर अपनी ड्यूटी की बहुत पाबंद थी। कभी भी अपने मरीज़ों की अनदेखी नहीं करती थी। कभी जब उसका ऑफ होता और मैं उससे बाहर चलने की ज़िद करता और वो, मना कर देती तो मैं नाराज़ हो जाता था। सच पूछो तो उस समय ये मरीज़ मुझे अपने दुश्मन लगते थे। और अस्पताल मेरा प्रतिद्वंदी।। लेकिन एस्तर मुझे मना लेती। फिर नर्स की ड्यूटी पर उसका लंबा चौड़ा भाषण शुरू हो जाता। और हम दोनों खिलखिला कर हंस देते”

“उस से शादी नहीं हुई?” पूरी कहानी सुनकर मेरे मन में उत्सुकता और भी बढ़ गयी थी।

विश्वंभर नाथ का दमकता मुख फीका पड़ गया। बोले,

“ हम दोनों तो चाहते थे, उस के घर वाले भी राज़ी थे।”

“ फिर अड़चन क्या थी” मैंने पूछा तो विश्वंभर नाथ लंबी सांस लेकर बोले,

“मैं अपने माता पिता का इकलौता बेटा हूं। दो बहने हैं। हम कान्यकुब्ज़ ब्राह्मण हैं और एस्तर क्रिश्चियन। मैंने अपनी मां से ज़िद की तो उन्होंने कहा कि मैं जो चाहे कर सकता हूं, पर फिर मेरी बहनों की शादी नहीं होगी। कोई हमारे साथ रिश्ता करने को तैयार नहीं होगा”

“ मेरे कर्तव्य और प्यार में जद्दोजहद शुरू हो गयी। कभी एक का पलड़ा ऊपर होता तो कभी दूसरा। उस स्थिति से उबरने में भी एस्तर ने ही मेरी सहायता की। अपने परिवार के प्रति अपना फ़र्ज़ पूरा करने के लिए उसने मुझे मानसिक रूप से तैयार किया। मां ने मेरी शादी अपनी ही जाति की रेणु से करवा दी। बहुत धूमधाम से शादी हुई। एस्तर भी आयी थी। मेरी पत्नी को खूब सूरत सा उपहार देकर चली गयी।”

“ उसके बाद कभी भेंट हुई एस्तर से?”

“नहीं, उसके बाद मैं उस से कभी नहीं मिला। विवाह की औपचारिकताओं से निबट कर जब मैं अस्पताल गया तो मैंने सुना, वो नौकरी छोड़कर किसी दूसरी जगह चली गयी है और वहीं उसने शादी भी कर ली है। फ़ेसबुक पर उसने अपना और अपने पति का फ़ोटो डाला भी था”

“आपने उससे मिलने की कोशिश भी नहीं की?”

“ नहीं,” विश्वंभर नाथ जी ने जवाब दिया,” प्यार में जब दिल टूटता है न तो सिर्फ़ दिल ही नहीं टूटता। लगता है कि ज़िंदगी की डोर ही टूट गयी। ऐसा दर्द, जिसे उस शख़्स के सिवा कोई नहीं समझ सकता। मुझे ऐसा लगने लगा था कि, न मैं घर के प्रति वफ़ादार रह पाऊंगा और न ही इस समाज के प्रति,जिस ने जांत पांत की दीवारें खड़ी करके मेरी एस्तर को मुझ से दूर कर दिया था। परंतु शांत मन से सोचा तो ,मुझे इसमें भी एस्तर की ही समझदारी और ईमानदारी की झलक दिखायी दी। ऐसे में उसके पास मैं क्या मुंह लेकर जाता?

दूसरे, अगर वो अपनी ज़िंदगी में खुश है और चाहती है कि मैं भी अपने वैवाहिक जीवन के प्रति ईमानदार रहूं तो मैं उसके त्याग को क्यों धूमिल करूं? मेरी ज़िंदगी तो बर्बाद होगी ही उसका सुख चैन तो ख़त्म हो जाएगा।”

“अब आप अस्पताल में इतना समय क्यों बिताते हैं? आपकी पत्नी को बुरा नहीं लगता” मैं ने उत्सुकता दिखाई

“ अपना अकेलापन दूर करने के लिए अस्पताल जाता हूं। रेणु अब इस दुनिया में नहीं है। शादी के एक साल बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी “

“ और अपनी ये कहानी फ़ेसबुक पर प्रसारित करने के लिए क्यों कह रहे हैं?”

“शायद मैंने आपको बताया था कि मैं एस्तर का अधिक से अधिक समय पाने के लिए उसकी ड्यूटी के दौरान उसकी मदद किया करता था। लेकिन दिल से उसकी कर्तव्य निष्ठा और सेवाभाव से चिढ़ता भी था। क्योंकि उसकी कर्तव्यनिष्ठा के कारण मुझे, उसका साथ बहुत कम समय के लिए ही मिल पाता था। अब मुझे वो सब याद आता है। अपनी गलती पर पछताता भी हूं। रोज़ अस्पताल में आकर जब मरीज़ों की सेवा को ,प्यार की पूजा मान कर करता हूं तो मुझे अपने उस अपराधबोध से मुक्ति मिलती है”

विश्वनाथ जी अपना मुंह मेरे कान के सामने ले आये और फुसफुसा कर बोले,

“एक राज की बात आपको और बताता हूं। इस अस्पताल के समूचे वातावरण में मुझे अभी भी वही सुगंध महसूस होती है, एस्तर के प्यार की ख़ुशबू। रही बात फ़ेसबुक पर कहानी लिखने की तो मेरी बात, उस तक पहुंचाने का कोई दूसरा तरीक़ा भी तो नहीं है। अगर वो इसे पढ़ेगी तो समझ जाएगी कि मैं उसे अभी भी कितना याद करता हूं, उसकी भावनाओं की कितनी इज़्ज़त करता हूं, यही प्यार मेरी पूजा है और पूजा मेरी सेवा है”

विश्वंभर नाथ जी की कहानी सुनकर मन भारी हो गया। मुंह से बेसाख़्ता निकल गया,

“ क्यों लेती है ज़िंदगी ऐसी करवट,

कि किसी को चाह कर भी अपना प्यार हासिल नहीं होता”

दोष चाहे समाज के नियमों का हो या माता पिता का, कम से कम दो प्यार करने वाले दिल इस तरह जुदा तो न हुए होते। लेकिन,एस्तर से रिश्ता टूटने के बाद भी उसकी यादों को तरोताज़ा रखने के लिए विश्वंभरनाथ जी का अथक प्रयास भी अपने प्यार को प्रदर्शित करने का अनूठा प्रयास भी सराहनीय था। किसी ने सही कहा है,

“प्यार वो नहीं जो,

कह कर दिखाया जाए

प्यार वो है जो,छुप कर भी दिखाया जाए”

-पुष्पा भाटिया

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